संदेश

चित्र
नवरात्रि 2026: कलश स्थापना, अखंड ज्योति, विधि,और मंत्र-पाठ सूर्यकांत द्विवेदी शारदीय नवरात्रि 11 अक्टूबर रविवार से प्रारम्भ हो रहे हैं जो 20 अक्टूबर को संपन्न होंगे। किसी भी कार्य को करने के लिए कलश स्थापना आवश्यक है। यह समस्त देवी-देवताओं का आह्वान है कि आप हमारे कार्य को सिद्ध करें और हमारे घर में विराजमान हों।... कलश स्थापना में विलंब नहीं करना चाहिए और समयानुसार कलश स्थापना कर देनी चाहिए। नवरात्रि में तो इसका अत्यंत महत्व है। आइये, आपको बताते हैं कि कलश स्थापना कैसे की जाए.... कलश स्थापना के लिए सामग्री -एक घड़ा या पात्र -घड़े में गंगाजल मिश्रित जल ( जल आधा न हो, केवल तीन उंगली नीचे तक जल होना चाहिए) -घड़े या पात्र पर रोली से ऊं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे लिखें या ऊं ह्रीं श्रीं ऊं लिखें -घड़े पर कलावा बांधें। यह पांच, सात या नौ बार लपटें -घड़े पर लगे कलावा में गांठ न बांधें -कलावा यदि लाल और पीला मिलाजुला हो तो बहुत अच्छा सामग्री -जौं -काले तिल -पीली सरसो -एक सुपारी -तीन लौंग के जोड़े ( यानी 6 लोंग) -एक सिक्का -आम के पत्ते (नौ) -नारियल ( नारियल पर चुन्नी लपेटे) -एक...

श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर विशेष

चित्र
कान्हा के बारे में यह भी जानिए भगवान श्रीकृष्ण पूर्णावतार हैं। लीलाधर। वह समस्त प्राणियों के हृदय में अनेकानेक रूपों में वास करते हैं। श्रीकृष्ण ने सभी को जाना लेकिन उनको कोई नहीं जान सका। वह बालक हैं, किशोर हैं, योगीराज हैं, कर्मपुरुष हैं, वह गुरु हैं, वह गोपाल हैं, केशव हैं, माधव हैं, मुरलीधर हैं, रासविहारी हैं, जगत विहारी हैं, युग प्रवर्तक हैं, प्रेमी हैं, शासक हैं, युद्ध संचालक, महान धनुर्धर हैं, सारथी हैं, मित्र हैं, करुणावतार हैं, दीनानाथ हैं, स्त्री उद्धारक हैं, मातृभक्त हैं, वेदों के विख्याता-आख्याता, अष्टावक्र गीता के उद्घोषक, कर्मप्रधान, नीति प्रधान, योग प्रधान, सांख्य प्रधान, गोपीजनवल्लभ, अच्युतानंद आदि अनेकानेक रूप से ख्यात हैं। लीलाएं अनंत। लेकिन उनको प्रिय है- अपनी बाल लीला। वो भी कौन सी- जब उन्होंने मुंह में मिट्टी रख ली। संभवतया यही कारण है कि कलियुग में भी उनको अपनी यही बाललीला पसंद है। वह बाल गोपाल अर्थात ठाकुरजी के रूप में ही अपने भक्तों के पास रहना चाहते हैं। आइये, ठाकुर जी के बारे में थोड़ा जानने का प्रयास करते हैं.... आठ का अंक : कृष्ण के जीवन में आठ के अंक का ...
चित्र
हनुमान जी के पाठ और अनुष्ठान श्री गुरु हनुमान जी के चरणों में वंदन करते हुए उनके कुछ सिद्ध अमोघ पाठ के विषय में चर्चा करते हैं। इनमें से कुछ पाठ आप नियमित करते होंगे। लेकिन कुछ नहीं। बाबा के समस्त पाठ और मंत्र ऋद्धि-सिद्धि प्रदान करते हैं। भक्त को किसी भी प्रकार का कष्ट नहीं होता। यदि होता भी है तो वह बाबा के प्रताप से शीघ्र ही मुक्त हो जाता है। यहां हम कुछ विधि आपको बता रहे हैं। यदि इन उपायों के साथ आप बाबा का पाठ करते हैं तो तीनों लोकों के ताप से आपको मुक्ति मिलती है। सुन्दरकाण्ड का पाठ श्रीरामचरित मानस का एक अध्याय है सुंदरकांड। प्रभु राम को यह सबसे प्रिय है। भगवान शँकर जी भी इसका गुणगान करते हैं। श्रीरामचरित मानस का यह हृदय है। इसमें सकल स्तुति है। यह अमोघ है। जो कोई इसका पाठ करता है, उसके दारुण दुखों का अंत होता है। सुंदरकांड पढ़ने का सही समय ब्रह्म मूहूर्त यानी सवेरे 4 बजे। यह सबसे उपयुक्त समय है। उसके बाद रात्रि 9 बजे और अपराह्न का समय यानी 2 बजे के बाद । वैसे आप कभी भी कर सकते हैं। यदि संपूर्ण पाठ आप नहीं कर सकते तो मंगलाचरण तो प्रतिदिन कीजिए। इसके साथ ही प्रबिसि नगर...

सूर्योपासना

चित्र
हिन्दू धर्म में सूर्य साक्षात देवता माने गए हैं। धार्मिक दृष्टि से सूर्य की उपासना व्यक्ति को निरोग और त्वचा रोग से मुक्त करती है। मनोकामनाओं की पूर्ति भी सूर्य पूजा से संभव है। असल में व्यावहारिक जीवन में भी सूर्य की रोशनी और ऊर्जा प्राणशक्ति का मुख्य साधन है। वैदिक काल से ही सूर्य शक्ति के देवता माने गए हैं। शास्त्रों में रविवार का दिन सूर्य पूजा के लिए बहुत ही शुभ फल देने वाला बताया गया है। सूर्य उपासना से शक्ति, सौंदर्य, तंदुरूस्ती और ज्ञान प्राप्ति होती है। जिससे ज़िंदगी में कामयाबी पाना आसान हो जाता है। वहीं इस उपासना में सूर्य के विशेष मंत्रों का जप मनोरथ पूर्ति में बहुत ही प्रभावी माने गए हैं। जानते हैं रविवार के दिन सूर्य उपासना के सरल उपायों को - - सुबह स्नान के बाद सूर्यदेव को अर्घ्य दें। अर्घ्य के लिए सफेद वस्त्र पहनकर एक पात्र में गंगा या शुद्ध जल लेकर उसमें लाल फूल डालकर और चंदन डालकर पूर्व दिशा की ओर मुख कर अर्घ्य दें। - इसके बाद पूजा में सूर्यदेव की प्रतिमा पर लाल फूल और लाल चन्दन लगाएं। साथ ही अन्य पूजन सामग्री अर्पित करें। - रविवार के दिन सूर्य मंत्र की अधिकाधिक माला ...

सूर्याष्टक

चित्र
सूर्याष्टक आदिदेव नमस्तुभ्यं प्रसीद मम भास्कर । दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोऽस्तुते ॥1॥ सप्ताश्वरथमारूढं प्रचण्डं कश्यपमात्मजम् । श्वेत पद्मधरं देवं तं सूर्य प्रणमाम्यहम ॥2॥ लोहितं रथमारूढं सर्वलोकपितामहम् । महापापहरं देवं तं सूर्य प्रणमाम्यहम ॥3॥ हे आदिदेव आपको नमस्कार है, मुझसे प्रसन्न होइये। हे दिवाकर! आपको नमन है। हे प्रभाकर! आपको नमन है। सप्ताश्वरथ पर आरूढ़, अत्यंत उग्र, कश्यपपुत्र, श्वेत, कमलधार देव उन सूर्य को मैं प्रणाम करता हूं। लोहित (लाल) वर्ण रंग के रथ पर आरूढ़ सब लोकों के पितामह, महापापों को हरने वाले, उन सूर्यदेव को मैं प्रणाम करता हूं॥1-3॥ त्रैगुण्यं च महाशूरं ब्रह्मविष्णुमहेश्वरम । महापापहरं देवं तं सूर्य प्रणमाम्यहम् ॥4॥ बश्हितं तेजर्पुद्बजं च वायुमाकाशमेव च । प्रभुं च सर्व लोकानां तं सूर्य प्रणमाम्यहम् ॥5॥ सत्व-रज-तम-मय, महान परामी, साक्षात ब्रह्मा-विष्णु-महेश, महापापों को हरने वाले उन सूर्य देव को मैं प्रणाम करता हूं। वश्हत् तेज पुद्बज, आकाश, वायु, सब लोकों के प्रभु उन सूर्य देव को मैं प्रणाम करता हूं॥4-5॥ बंधुक पुष्पसंकाशं हारकुण्डलभूषितम् । एकचधरं देवं तं सूर...

निराला भोला

चित्र
श्रावण मास भगवान शंकर को समर्पित है। हर तरफ भोले हैं। शिव के मतवाले हैं। कांवड़ ही कांवड़। गंगाजल की यात्रा। गंगाधर का गान। मानो. शंकर जी की बारात चढ़ रही है। वस्तुत: यह शंकर जी के पाणिग्रहण का ही उत्सव है। श्रावण मास की शिवरात्रि भगवान शंकर और पार्वती के मिलन का उत्सव है। फाल्गुन मास की शिवरात्रि ही महाशिवरात्रि कही गई। महाशिवरात्रि निराकार भक्ति का पर्व है तो शिवरात्रि साकार भक्ति का पर्व। एको हि रुद्रो द्वितीयानस्तु..। एक ही रुद्र है दूसरा नहीं है। यह भारतीय सनातन परंपरा में एकेश्वरवाद के सिद्धांत का निष्पादन करती है। हम बहुदेववादी माने जाते हैं। निराकारत्व की बात हम नहीं करते। लेकिन शंकर जी के सत्यं, शिवम् और सुंदरम् का संदेश ही इस एकेश्वरवाद में निहित है। सत्य क्या है...सृजन-संहार। शिवम क्या है...संतान और सुंदरम क्या है....सृष्टि। इन्हीं तीनों के निहितार्थ बना ऊं। अ+उ+म। अकार, उकार और मकार। यानी सृष्टि, पालन और संहार। यही सनातन सत्य है और इसी को हम यह कहकर अंगीकार करते हैं कि सबको पैदा करने वाला, पालन करने वाला और संहार करने वाला तो परमपिता परमेश्वर है। फाल्गुन मास की महाशिवरात्र...

यूं हैं श्रीकृष्ण पूर्णावतार

चित्र
जो कहना है कहो मगर कान्हा से, बुरा नहीं मानते हमारे माधव -संत प्रवर विजय कौशल हमारे समस्त अवतारों में भगवान श्री कृष्ण ऐसे अनोखे अवतार हैं जिनका जन्मोत्सव विश्व के हर कोने में निवास करने वाला हल वर्ग का हिंदू बड़े उत्साह, उल्लास और भाव से मनाता है। भारत में तो जेलों में, थानों में तथा पुलिस लाइनों में इतने उल्लास के साथ मनाते हैं कि ऐसा लगता है कि मानों भगवान श्री कृष्ण इस विभाग के निज देव हों। शास्त्रज्ञ विद्वानों में कई बार इस विषय पर शास्त्रार्थ होता है कि भगवान श्री राम और भगवान श्री कृष्ण में छोटा बड़ा कौन है। उनकी कलाओं की संख्या पर अनेक तरह की चर्चा होती है। वाद-विवाद होता है। होना भी चाहिए क्योंकि हिंदू समाज जड़ समाज नहीं है। पूर्ण विकसित चिंतन वाला समाज है। अपने भगवान पर खुलकर चर्चा करने की छूट और साहस यह हिंदुओं के पास है। अन्य समाज में तो भगवान के बारे में कुछ बोल पाना महाअपराध माना जाता है। कई बार इनकी चर्चाएं दंगे और अशांति का कारण भी बन जाती हैं। जीवन में आनंद और प्रसन्नता के लिए मनुष्य की चिंतन धारा प्रवाहमान होनी चाहिए। जड़ता मनुष्य को गूढ़ ब...