शनिवार, 10 अक्टूबर 2026

नवरात्रि 2026: कलश स्थापना, अखंड ज्योति, विधि,और मंत्र-पाठ सूर्यकांत द्विवेदी


शारदीय नवरात्रि 11 अक्टूबर रविवार से प्रारम्भ हो रहे हैं जो 20 अक्टूबर को संपन्न होंगे। किसी भी कार्य को करने के लिए कलश स्थापना आवश्यक है। यह समस्त देवी-देवताओं का आह्वान है कि आप हमारे कार्य को सिद्ध करें और हमारे घर में विराजमान हों।... कलश स्थापना में विलंब नहीं करना चाहिए और समयानुसार कलश स्थापना कर देनी चाहिए। नवरात्रि में तो इसका अत्यंत महत्व है। आइये, आपको बताते हैं कि कलश स्थापना कैसे की जाए.... कलश स्थापना के लिए सामग्री -एक घड़ा या पात्र -घड़े में गंगाजल मिश्रित जल ( जल आधा न हो, केवल तीन उंगली नीचे तक जल होना चाहिए) -घड़े या पात्र पर रोली से ऊं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे लिखें या ऊं ह्रीं श्रीं ऊं लिखें -घड़े पर कलावा बांधें। यह पांच, सात या नौ बार लपटें -घड़े पर लगे कलावा में गांठ न बांधें -कलावा यदि लाल और पीला मिलाजुला हो तो बहुत अच्छा सामग्री -जौं -काले तिल -पीली सरसो -एक सुपारी -तीन लौंग के जोड़े ( यानी 6 लोंग) -एक सिक्का -आम के पत्ते (नौ) -नारियल ( नारियल पर चुन्नी लपेटे) -एक पान -अपने आसन के नीचे थोड़ा सा जल और चावल डालकर शुद्ध कर लें -इसके बाद भगवान गणपति का ध्यान करें। फिर शंकर जी का, विष्णु जी का, वरुण जी का और नवग्रह का -आह्वान के बाद मां दुर्गा की स्तुति करें। यदि कोई मंत्र याद नहीं है तो दुर्गा चालीसा पढ़ें। यदि वह भी याद नहीं है तो ऊं दुर्गायै नम: का जाप करते रहें -ध्यान रहे, कलश स्थापना में पूरा परिवार सम्मिलित हो। ऊं दुर्गायै नम: ऊं नवरात्रि नमो नम: का उच्चारण करते हुए कलश स्थापित करें -जिस स्थान पर कलश स्थापित करें, वहां थोड़े से साबुत चावल डाल दें। जगह साफ हो -घड़े या पात्र पर आम के पत्ते सजा दें -पहले जल में सुपारी अर्पित करें। तदुपरांत चावल, फिर काले तिल, लोंग, फिर पीली सरसो, फिर जौं, फिर सिक्का डालें। -अब नारियल लें। उस पर चुनरी बांधें, पान लगाएं और कलावा पांच या सात या 8 या 9 बार लपेट लें। ( अगर अष्टमी होती है तो 8, नौमी करते हों तो 9) अब सभी लोग खड़े हो जाएं... -नारियल को हाथ में लेकर माथे पर लगाएं और मां भगवती की प्रार्थना करें। - अर्गला स्त्रोत, सिद्ध कुंजिका के मंत्र या दुर्गा चालीसा पढ़ें - अन्यथा ॐ दुं दुर्गाये नमः 11 बार पढ़ते हुए कलश स्थापित कर दें। - कलश पर फूल माला और चुनरी अर्पित करें। - कलश की फूल माला हो तो हर दिन बदलेगी। यदि मोती की है तो नहीं। - कलश की प्रतिदिन पूजा करें। एक - एक बिंदी हर दिन कलश पर लगाते रहें । - कलश और घी का दीपक दाहिने हाथ होगा। कलश स्थापना मंत्र ... नमस्तेsतु महारौद्रे महाघोर पराक्रमे।। महाबले महोत्साहे महाभय विनाशिनी या ऊं श्रीं ऊं या ॐ ॐ दुं दुर्गाये नमः या ॐ श्रीं श्रीं हूं अखंड ज्योति अखंड ज्योति माचिस की तिल्ली से सीधे न जलाएं। एक चमचा में कपूर रखें। एक लॉन्ग का जोड़ा। अब कपूर जलाएं। यह मंत्र पढ़ते हुए कपूर की अग्नि से ज्योति प्रज्ज्वलित करें...इस मंत्र के साथ ॐ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तुते॥ ( हे माँ नारायणी! आप सभी मंगलों में परम मंगलमयी हैं, कल्याणकारी हैं और सभी मनोरथों को पूर्ण करने वाली हैं। हे शरण देने वाली, तीन नेत्रों वाली माँ गौरी! आपको मेरा नमन है।) अब कपूर की आरती को अपने घर की चारों दिशाओं में घुमाएं। ( टायलेट को छोड़कर) अखंड ज्योति में एक लॉन्ग का जोड़ा अर्पित करें। मां से प्रार्थना करें...इस ज्योति को अखंड रखें। घर में सुख, शांति, यश, वैभव, समृद्धि और आरोग्य प्रदान करें। तेल की अखंड ज्योति यदि आप काली जी और मां पीताम्बरा जी के उपासक हैं तो घी के साथ सरसों या तिल के तेल की भी अखंड ज्योति कर सकते हैं। १. तेल का दीपक बाएं हाथ होगा। २. इसमें पीली सरसों और काले तिल के कुछ दाने अर्पित करें। ३. पहले घी का दीपक चलेगा, उसके बाद तेल का। ४. तेल की अखंड ज्योति होगी तो रात्रिकालीन पूजा अनिवार्य रूप से होगी। रात को 9 बजे से 11 बजे के मध्य। ५. प्रतिदिन संध्या आरती क्रेम अनिवार्य कलश, अखंड ज्योति और पूजा के प्रतिदिन के दीपक को कभी भी इधर -उधर नहींं करना चाहिए। निश्चित स्थान पर रखें। कलश स्थापना पर ध्यान रखें -प्रतिदिन कलश की पूजा करें। हर नवरात्रि की एक बिंदी कलश पर लगाते रहें -यदि किसी दिन दो नवरात्रि हैं तो दो बिंदी (रोली की) लगाते रहें -कलश की पूजा हर दिन करते रहें और आरती भी। मंत्र संकल्प - किसी एक मंत्र का प्रतिदिन जाप करें - संकल्प के अनुसार माला करें 1 या अधिक। चाहे एक करें या 5 । घटाए बढ़ाएं नहीं। श्री दुर्गा सप्तशती पाठ समय नहीं तो... १. सप्तश्लोकी दुर्गा २. श्री सिद्ध कुंजिका स्त्रोत ३. श्री देवी सूक्तम समय हो तो संपूर्ण पाठ करें अथवा -देवी कवच, अर्गला स्त्रोत, कीलकम और देवी सूक्तम ( प्रतिदिन) विशेष मनोकामना के पाठ श्री दुर्गा सप्तशती का 5, 6 और 11 वाँ अध्याय विद्यार्थियों के लिए 11 वाँ अध्याय सुहागिन के लिए 6 अध्याय नौकरीपेशा/ बीमार/ शत्रु शांति/ ग्रह पीड़ा निवारण के लिए -अर्गला स्त्रोत और सिद्ध कुंजिका ( दोनों पाठ इसी क्रम में होंगे।) कलश स्थापना मुहूर्त प्रातः 7.46 से 12.06 बजे तक अभिजीत मुहूर्त प्रातः 11.20 से दोपहर 12.06 बजे तक माता रानी हाथी पर आएंगी और पैदल प्रस्थान करेंगी। जय माता दी

शनिवार, 29 अगस्त 2026

श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर विशेष

कान्हा के बारे में यह भी जानिए भगवान श्रीकृष्ण पूर्णावतार हैं। लीलाधर। वह समस्त प्राणियों के हृदय में अनेकानेक रूपों में वास करते हैं। श्रीकृष्ण ने सभी को जाना लेकिन उनको कोई नहीं जान सका। वह बालक हैं, किशोर हैं, योगीराज हैं, कर्मपुरुष हैं, वह गुरु हैं, वह गोपाल हैं, केशव हैं, माधव हैं, मुरलीधर हैं, रासविहारी हैं, जगत विहारी हैं, युग प्रवर्तक हैं, प्रेमी हैं, शासक हैं, युद्ध संचालक, महान धनुर्धर हैं, सारथी हैं, मित्र हैं, करुणावतार हैं, दीनानाथ हैं, स्त्री उद्धारक हैं, मातृभक्त हैं, वेदों के विख्याता-आख्याता, अष्टावक्र गीता के उद्घोषक, कर्मप्रधान, नीति प्रधान, योग प्रधान, सांख्य प्रधान, गोपीजनवल्लभ, अच्युतानंद आदि अनेकानेक रूप से ख्यात हैं। लीलाएं अनंत। लेकिन उनको प्रिय है- अपनी बाल लीला। वो भी कौन सी- जब उन्होंने मुंह में मिट्टी रख ली। संभवतया यही कारण है कि कलियुग में भी उनको अपनी यही बाललीला पसंद है। वह बाल गोपाल अर्थात ठाकुरजी के रूप में ही अपने भक्तों के पास रहना चाहते हैं। आइये, ठाकुर जी के बारे में थोड़ा जानने का प्रयास करते हैं.... आठ का अंक : कृष्ण के जीवन में आठ के अंक का विशेष महत्व है। उनका जन्म आठवें मनु के काल में अष्टमी के दिन वसुदेव के आठवें पुत्र के रूप में जन्म हुआ था। उनकी आठ सखियां, आठमित्र और आठ शत्रु थे। *कृष्ण के माता-पिता : कृष्ण की माता का नाम देवकी और पिता का नाम वसुदेव था। कारागार में जन्म हुआ। पालन-पोषण किया- यशोदा और नंद ने। बलराम की माता रोहिणी ने भी उन्हें माता के समान दुलार दिया। रोहिणी वसुदेव की पत्नी थीं। यह भी जानिए *कृष्ण के गुरु : गुरु संदीपनि ने कृष्ण को वेद शास्त्रों सहित 14 विद्या और 64 कलाओं का ज्ञान दिया था। कृष्ण के भाई : कृष्ण के भाइयों में नेमिनाथ, बलराम और गद थे। कृष्ण की बहनें : कृष्ण की तीन बहनें थी : 1. एकानंगा (यह यशोदा की पुत्री थीं)। 2. सुभद्रा : वसुदेव की दूसरी पत्नी रोहिणी से बलराम और सुभद्र का जन्म हुआ। वसुदेव देवकी के साथ जिस समय कारागृह में बंदी थे, उस समय ये नंद के यहां रहती थीं। 3. द्रौपदी : पांडवों की पत्नी द्रौपदी हालांकि कृष्ण की बहन नहीं थी, लेकिन श्रीकृष्ण इसे अपनी मानस ‍भगिनी मानते थे। चीर हरण के समय श्रीकृष्ण ने ही द्रोपदी की लाज बचाई थी। कृष्ण की पत्नियां : रुक्मिणी, जाम्बवंती, सत्यभामा, मित्रवंदा, सत्या, लक्ष्मणा, भद्रा और कालिंदी। कृष्ण के पुत्र : रुक्मणी से प्रद्युम्न, चारुदेष्ण, जम्बवंती से साम्ब, मित्रवंदा से वृक, सत्या से वीर, सत्यभामा से भानु, लक्ष्मणा से..., भद्रा से... और कालिंदी से...। कृष्ण की पुत्रियां : रुक्मणी से कृष्ण की एक पुत्री थीं जिसका नाम चारू था। कृष्ण के पौत्र : प्रद्युम्न से अनिरुद्ध। अनिरुद्ध का विवाह वाणासुर की पुत्री उषा के साथ हुआ था। कृष्ण की 8 सखियां : राधा, ललिता आदि सहित कृष्ण की 8 सखियां थीं। चन्द्रावली, श्यामा, शैव्या, पद्या, राधा, ललिता, विशाखा तथा भद्रा। कुछ जगह ये नाम इस प्रकार हैं- चित्रा, सुदेवी, ललिता, विशाखा, चम्पकलता, तुंगविद्या, इन्दुलेखा, रग्डदेवी और सुदेवी। इसके अलावा भौमासुर से मुक्त कराई गई सभी महिलाएं कृष्ण की सखियां थीं। कृष्ण के 8 मित्र : श्रीदामा, सुदामा, सुबल, स्तोक कृष्ण, अर्जुन, वृषबन्धु, मन:सौख्य, सुभग, बली और प्राणभानु। कृष्ण के शत्रु : कंस, जरासंध, शिशुपाल, कालयवन, पौंड्रक। कृष्ण ने किया जिनका वध : ताड़का, पूतना, चाणूड़, शकटासुर, कालिया, धेनुक, प्रलंब, अरिष्टासुर, बकासुर, तृणावर्त अघासुर, मुष्टिक, यमलार्जुन, द्विविद, केशी, व्योमासुर, कंस, प्रौंड्रक और नरकासुर आदि। कृष्ण चिन्ह : सुदर्शन चक्र, मोर मुकुट, बंसी, पांचजन्य शंख, गाय, कमल का फूल और माखन मिश्री। कृष्ण लोक : वैकुंठ, गोलोक, विष्णुलोक। कृष्ण ग्रंथ : महाभारत और गीता कृष्ण का कुल : यदुकुल। कृष्ण के समय उनके कुल के कुल 18 कुल थे। इस कुल की कुल 18 शाखाएं थीं। व्रज और हस्तिनापुर श्रीकृष्ण के पौत्र वज्रनाभ को द्वारिका से मथुरा लाकर उन्हें मथुरा जनपद का शासक बनाया गया। इसी समय परीक्षित भी हस्तिनापुर की गद्दी पर बैठाए गए। वज्र के नाम पर बाद में यह संपूर्ण क्षेत्र ब्रज कहलाने लगा। कृष्ण नगर : मथुरा, गोकुल, नंदगाव, वृंदावन, गोवर्धन, बरसाना, मधुवन और द्वारिका। कृष्ण पर्व : श्रीकृष्णी ने ही होली और अन्नकूट महोत्सव की शुरुआत की थी। आयु- उनकी आयु १२५ और कुछ ११० वर्ष बताते हैं। ऐसे थे श्रीकृष्ण.... कृष्ण की त्वचा का रंग मेघश्यामल था -कॄष्ण के परमधामगमन के समय ना तो उनका एक भी केश श्वेत था और ना ही उनके शरीर पर कोई झुर्री थी -कॄष्ण से बदली गयी यशोदापुत्री का नाम एकानंशा था। राधा रानी * कॄष्ण की प्रेमिका ' राधा ' का जिक्र महाभारत , हरिवंशपुराण , विष्णुपुराण और भागवतपुराण में नहीं है , उनका उल्लेख बॄम्हवैवर्त पुराण , गीत गोविंद और जनश्रुतियों में रहा है। यह भी माना जाता है कि श्रीकृष्ण सिर्फ एक बार राधा से मिले थे। कॄष्ण अंतिम वर्षों को छोड्कर कभी भी द्वारिका में ६ महीने से ज्यादा नहीं रहे . -कॄष्ण के धनुष का नाम शार्ंग और मुख्य आयुध चक्र का नाम ' सुदर्शन ' था। कृष्ण ने दो नगरों की स्थापना की थी - द्वारिका (कुशावती) और पांडव पुत्रो के द्वारा इंद्रप्रस्थ (पूर्व में खांडवप्रस्थ, वर्तमान में दिल्ली और आसपास का क्षेत्र। कर्मक्षेत्र- हस्तिनापुर, इंद्रप्रस्थ और कुरुक्षेत्र ( जहां महाभारत हुई) सर्वाधिक समय- श्रीकृष्ण का अधिकांश समय इंद्रप्रस्थ ( एनसीआर) और हस्तिनापुर में ही बीता प्रसिद्ध लीला- मिट्टी खाना श्रीकृष्ण आराधना ( इनकी आराधना से चारों कृपा मिलती हैं) -ईश्वरकृपा, शास्त्रकृपा, गुरुकृपा और आत्मकृपा। प्रिय रास- डांडिया प्रिय पर्व- होली और अन्नकूट प्रिय भोग- माखन-मिश्री प्रिय पेड़- कदंब प्रिय वादन- वंशी प्रिय पोशाक- पीतांबर प्रिय चिह्न- मोर पंख प्रिय स्नान- शंखाभिषेक प्रिय स्वरूप- बाल गोपाल ( ठाकुरजी) प्रिय मंत्र- ऊं नमो भगवते वासुदेवाय नम: प्रिय धार्मिक शास्त्र-श्रीमद्भागवत और गीता सूर्यकांत

मंगलवार, 31 मार्च 2026

हनुमान जी के पाठ और अनुष्ठान
श्री गुरु हनुमान जी के चरणों में वंदन करते हुए उनके कुछ सिद्ध अमोघ पाठ के विषय में चर्चा करते हैं। इनमें से कुछ पाठ आप नियमित करते होंगे। लेकिन कुछ नहीं। बाबा के समस्त पाठ और मंत्र ऋद्धि-सिद्धि प्रदान करते हैं। भक्त को किसी भी प्रकार का कष्ट नहीं होता। यदि होता भी है तो वह बाबा के प्रताप से शीघ्र ही मुक्त हो जाता है। यहां हम कुछ विधि आपको बता रहे हैं। यदि इन उपायों के साथ आप बाबा का पाठ करते हैं तो तीनों लोकों के ताप से आपको मुक्ति मिलती है। सुन्दरकाण्ड का पाठ श्रीरामचरित मानस का एक अध्याय है सुंदरकांड। प्रभु राम को यह सबसे प्रिय है। भगवान शँकर जी भी इसका गुणगान करते हैं। श्रीरामचरित मानस का यह हृदय है। इसमें सकल स्तुति है। यह अमोघ है। जो कोई इसका पाठ करता है, उसके दारुण दुखों का अंत होता है। सुंदरकांड पढ़ने का सही समय ब्रह्म मूहूर्त यानी सवेरे 4 बजे। यह सबसे उपयुक्त समय है। उसके बाद रात्रि 9 बजे और अपराह्न का समय यानी 2 बजे के बाद । वैसे आप कभी भी कर सकते हैं। यदि संपूर्ण पाठ आप नहीं कर सकते तो मंगलाचरण तो प्रतिदिन कीजिए। इसके साथ ही प्रबिसि नगर कीजे सब काजा.....और कहेऊ तात अस मोर प्रनामा की चौपाई अपनी नियमित पूजा में शामिल कर लें। बहुत लाभ होगा। जब भी परेशान हों तो इन चौपाइयों को 11 या 21 बार कर लीजिए।
श्रीसुंदरकांड के अनुष्ठान सरल अनुष्ठान श्री सुंदरकांड के अनुष्ठान अमोघ हैं। नियत समय पर प्रतिदिन 5,9,11,21,31 दिन श्री सुंदरकांड का पाठ कीजिए। पहले संकल्प कीजिए। बाबा से अपनी मनोकामना कहिए। फिर एकाग्रचित्त होकर पाठ कीजिए। पाठ के दौरान थोड़ी परेशानी आ सकती हैं। जैसे बुखार आदि। लेकिन आपका अनुष्ठान पूर्ण हो जाएगा। पूर्णता दिवस पर हवन कीजिए। बाबा को चोला चढाइये। यह सरल अनुष्ठान है। अनुष्ठान अवधि में ब्रह्मचर्य का पालन कीजिए। सात्विक भोजन कीजिए। कठिन अनुष्ठान यह अनुष्ठान 49 या 59 दिन का होता है। प्रतिदिन सुंदरकांड का पाठ कीजिए। पांच बार हनुमान चालीसा का पाठ कीजिए। मंगलवार और शनिवार को बाबा की अखंड ज्योति जलाएं। बेसन के लड्डू का प्रशाद चढाएं। ऊं हनुमते नम: की 11 माला कीजिए। ये पाठ लगातार होने हैं। इस दौरान भी बाधाएं आ सकती हैं अंतिम चरण में। यानी 40 या 50 पाठ होने के बाद। तब आप ऊं नम: शिवाय की एक माला कर लीजिए। आपके पाठ पूरे हो जाएंगे। बाबा आपकी मनोकामना पूरी करेंगे। बाल तोड़, बुखार और पेट की दिक्कत हो सकती है। घबराइये नहीं। बाबा की कृपा से पाठ पूरे होंगे।
हनुमान चालीसा अनुष्ठान आप और हम प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं। यदि आप प्रतिदिन 5 या 11 बार हनुमान चालीसा करते हैं तो बहुत अच्छा है। लेकिन यदि बजरंगबाण भी अंत में कर लेते हैं, तो इसका लाभ दोगुना हो जाता है। कभी अवसर मिले तो वर्ष में एक बार 108 हनुमान चालीसा कर लेनी चाहिए। बजरंगबाण-रोग मुक्ति का अनुष्ठान बाबा का यह पाठ सारे रोगों का नाश करता है। आपको भूत-प्रेत, ऊपरी असर से बचाता है। इसमें बाबा के तांत्रिक मंत्र हैं। इसकी ऊर्जा अधिक है। पावर अधिक है। इसलिए, इसका पाठ अधिक नहीं करना चाहिए। इससे शरीर में रक्त का प्रवाह बढ़ जाता है। अत: बजरंगबाण से पहले और बाद में अवश्य हनुमान चालीसा करें। बजरंगबाण का भी अनुष्ठान है। आप एक लोटा जल सामने रखिए। फिर तीन बार बजरंगबाण पढ़िये। इस जल का सेवन कीजिए। बीमार हों तो दवा भी इससे ले सकते हैं। आप रोगमुक्त हो जाएंगे। वड्वानल स्त्रोत तांत्रिक दृष्टि से यह सर्वाधिक पावरफुल मंत्र है। इसको सुनने मात्र से सारी समस्याओं से मुक्ति मिल जाती है। इस पाठ को केवल एक बार रात में सुनना चाहिए। अधिक संख्या में न सुनें। उपरोक्त सभी पाठ पूर्ण होने पर बाबा की आरती करें। आरती के बाद एक लौंग का जोड़ा अपने ऊपर से उतारकर कपूर में जला दें। बहुत लाभ होगा। बाबा के सिद्ध मंत्र मंत्र 1.ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय सर्वशत्रुसंहारणाय । सर्वरोग हराय सर्ववशीकरणाय रामदूताय स्वाहा इस मंत्र की यदि एक माला (108) बार करते हैं तो सारे दुख, रोग दूर हो जाते हैं। श्री हनुमान गायत्री मंत्र 1.ॐ आञ्जनेयाय विद्महे वायुपुत्राय, धीमहि तन्नो हनुमत् प्रचोदयात् । या 2.ऊँ अंजनीसुताय विद्महे वायुपुत्राय धामहि, तन्नो मारुति प्रचोदयात।. ऐसी मान्यता है कि हनुमान जी से जुड़ा कोई भी मंत्र या पाठ अन्य किसी भी मंत्र से अधिक शक्तिशाली होता है। हनुमान जी अपने भक्तों को उनकी उपासना के फल में बल और शक्ति प्रदान करते हैं। पाठ या अनुष्ठान संबंधी कोई जिज्ञासा हो तो आप पूछ सकते हैं ।
पंडित सूर्यकान्त द्विवेदी

शनिवार, 14 जनवरी 2012

सूर्योपासना


हिन्दू धर्म में सूर्य साक्षात देवता माने गए हैं। धार्मिक दृष्टि से सूर्य की उपासना व्यक्ति को निरोग और त्वचा रोग से मुक्त करती है। मनोकामनाओं की पूर्ति भी सूर्य पूजा से संभव है। असल में व्यावहारिक जीवन में भी सूर्य की रोशनी और ऊर्जा प्राणशक्ति का मुख्य साधन है।

वैदिक काल से ही सूर्य शक्ति के देवता माने गए हैं। शास्त्रों में रविवार का दिन सूर्य पूजा के लिए बहुत ही शुभ फल देने वाला बताया गया है। सूर्य उपासना से शक्ति, सौंदर्य, तंदुरूस्ती और ज्ञान प्राप्ति होती है। जिससे ज़िंदगी में कामयाबी पाना आसान हो जाता है। वहीं इस उपासना में सूर्य के विशेष मंत्रों का जप मनोरथ पूर्ति में बहुत ही प्रभावी माने गए हैं।

जानते हैं रविवार के दिन सूर्य उपासना के सरल उपायों को -

- सुबह स्नान के बाद सूर्यदेव को अर्घ्य दें। अर्घ्य के लिए सफेद वस्त्र पहनकर एक पात्र में गंगा या शुद्ध जल लेकर उसमें लाल फूल डालकर और चंदन डालकर पूर्व दिशा की ओर मुख कर अर्घ्य दें।

- इसके बाद पूजा में सूर्यदेव की प्रतिमा पर लाल फूल और लाल चन्दन लगाएं। साथ ही अन्य पूजन सामग्री अर्पित करें।

- रविवार के दिन सूर्य मंत्र की अधिकाधिक माला का जप बहुत प्रभावी होता है। शास्त्रों में कार्य के अनुसार भी सूर्य के भी अलग-अलग बीज मंत्र बताए गए हैं। जिनका जप हर कार्यक्षेत्र में मनचाहा और निश्चित फल देता है -

नौकरीपेशा, व्यवसायी या बिजनेसमेन के लिए -

ऊँ ह्रीं घृणि सूर्यादित्य एं

अध्यापक या ब्राह्मणों के लिए -

ऊँ ह्रीं घृणि सूर्यादित्य ऊँ

सिपाही, सुरक्षाकर्मियों के लिए -

ऊँ ह्रीं घृणि सूर्यादित्य एं

इन सूर्य मंत्रों का जप धार्मिक दृष्टि से व्यक्ति के कार्यों या इच्छापूर्ति मे आ रही बाधाओं को दूर करता है। जिससे व्यावहारिक रुप से उसका विश्वास और मनोबल ऊँचा होता है। आम भाषा में कहें तो आत्मविश्वास से लबरेज व्यक्ति जिंदादिल हो जाता है। इसलिये भी सूर्य जीवन शक्ति देने वाले देवता माने जाते हैं।

सूर्याष्टक


सूर्याष्टक

आदिदेव नमस्तुभ्यं प्रसीद मम भास्कर ।
दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोऽस्तुते ॥1॥
सप्ताश्वरथमारूढं प्रचण्डं कश्यपमात्मजम् ।
श्वेत पद्मधरं देवं तं सूर्य प्रणमाम्यहम ॥2॥
लोहितं रथमारूढं सर्वलोकपितामहम् ।
महापापहरं देवं तं सूर्य प्रणमाम्यहम ॥3॥
हे आदिदेव आपको नमस्कार है, मुझसे प्रसन्न होइये। हे दिवाकर! आपको नमन है। हे प्रभाकर! आपको नमन है। सप्ताश्वरथ पर आरूढ़, अत्यंत उग्र, कश्यपपुत्र, श्वेत, कमलधार देव उन सूर्य को मैं प्रणाम करता हूं। लोहित (लाल) वर्ण रंग के रथ पर आरूढ़ सब लोकों के पितामह, महापापों को हरने वाले, उन सूर्यदेव को मैं प्रणाम करता हूं॥1-3॥
त्रैगुण्यं च महाशूरं ब्रह्मविष्णुमहेश्वरम ।
महापापहरं देवं तं सूर्य प्रणमाम्यहम् ॥4॥
बश्हितं तेजर्पुद्बजं च वायुमाकाशमेव च ।
प्रभुं च सर्व लोकानां तं सूर्य प्रणमाम्यहम् ॥5॥
सत्व-रज-तम-मय, महान परामी, साक्षात ब्रह्मा-विष्णु-महेश, महापापों को हरने वाले उन सूर्य देव को मैं प्रणाम करता हूं। वश्हत् तेज पुद्बज, आकाश, वायु, सब लोकों के प्रभु उन सूर्य देव को मैं प्रणाम करता हूं॥4-5॥
बंधुक पुष्पसंकाशं हारकुण्डलभूषितम् ।
एकचधरं देवं तं सूर्य प्रणमाम्यहम् ॥6॥
बन्धुक पुष्प जैसे, हार, कुण्डल जैसे भूषित, एकच को धारण करने वाले उन सूर्य देव को मैं प्रणाम करता हूं॥6॥
तं सूर्य जगत्कर्तारं महातेज: प्रदीपनम् ।
महापापहरं देवं तं सूर्य प्रणमाम्यहम् ॥7॥
तं सूर्य जगतां नाथं ज्ञानविज्ञानमोक्षदम् ।
महापापहरं देवं तं सूर्य प्रणमाम्यहम् ॥8॥
उन जगत के कर्ता, महातेज से प्रदीप्त, महापाप को हरने वाले उन सूर्य देव को मैं प्रणाम करता हूं। सब संसारों के नाथ, ज्ञान-विज्ञान और मोक्षदायी, महापापहारी उन सूर्य को मैं प्रणाम करता हूं॥7-8॥
॥इति श्री शिवप्रोक्तं सूर्याष्टकं सम्पूर्णम्॥

मंगलवार, 26 जुलाई 2011

निराला भोला



श्रावण मास भगवान शंकर को समर्पित है। हर तरफ भोले हैं। शिव के मतवाले हैं। कांवड़ ही कांवड़। गंगाजल की यात्रा। गंगाधर का गान। मानो. शंकर जी की बारात चढ़ रही है। वस्तुत: यह शंकर जी के पाणिग्रहण का ही उत्सव है। श्रावण मास की शिवरात्रि भगवान शंकर और पार्वती के मिलन का उत्सव है। फाल्गुन मास की शिवरात्रि ही महाशिवरात्रि कही गई। महाशिवरात्रि निराकार भक्ति का पर्व है तो शिवरात्रि साकार भक्ति का पर्व।
एको हि रुद्रो द्वितीयानस्तु..। एक ही रुद्र है दूसरा नहीं है। यह भारतीय सनातन परंपरा में एकेश्वरवाद के सिद्धांत का निष्पादन करती है। हम बहुदेववादी माने जाते हैं। निराकारत्व की बात हम नहीं करते। लेकिन शंकर जी के सत्यं, शिवम् और सुंदरम् का संदेश ही इस एकेश्वरवाद में निहित है। सत्य क्या है...सृजन-संहार। शिवम क्या है...संतान और सुंदरम क्या है....सृष्टि। इन्हीं तीनों के निहितार्थ बना ऊं। अ+उ+म। अकार, उकार और मकार। यानी सृष्टि, पालन और संहार। यही सनातन सत्य है और इसी को हम यह कहकर अंगीकार करते हैं कि सबको पैदा करने वाला, पालन करने वाला और संहार करने वाला तो परमपिता परमेश्वर है। फाल्गुन मास की महाशिवरात्रि यह बताने के लिए है कि जो आया है, वह जाएगा भी। अपने को अजेय मत मानो। एक ही तत्व की ही प्रधानता...कहो उसे जड़ या चेतन।
भगवान शंकर अकेले ऐसे इष्ट हैं जो साकार और निराकार दोनों हैं। गंगाजल तो शिवलिंग पर ही अर्पण होगा। श्रीविग्रहों का तो मात्र दर्शन होगा। अस्तु, साकार भक्ति के साथ निराकारत्व ही भगवान शंकर की अर्चना है।
अब बात करते हैं सावन की शिवरात्रि की। एक असुर था नरकासुर। उसने घोर तप करके ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त कर लिया कि उसका अंत होगा तो केवल शंकर जी के शुक्र से उत्पन्न पुत्र द्वारा। अन्यथा नहीं। उसने सोचा कि न शंकर जी विवाह करेंगे और न उनके पुत्र होगा और न उसका अंत होगा। वरदान प्राप्त करके नरकासुर ने उत्पात मचाना शुरु कर दिया। शंकर जी को जैसे-तैसे विवाह के लिए राजी किया। शंकर जी विवाह के लिए चले। उनका आलोकिक श्रृंगार हुआ....शिवहिं शंभु गन करहिं श्रृंगारा, जटामुकुट अहि मोर संवारा..। क्या बारात थी। क्या श्रृंगार था। मतवालों की टोली। कोउ मुख हीन, विपुल मुख काहू। किसी के मुंह नहीं तो किसी का बड़ा मुख। अद्भुत और अचंभित बारात। बारात जब उमा के घर पहुंची और उनकी मां मैना आरती करने आई तो देखती की देखती रह गई। सांप ने फुंकार मारी और आरती का थाल नीचे गिर गया।
प्रसंगानुसार भगवान शंकर और पार्वती का मांगलिक मिलन हुआ। इस मिलन से कार्तिकेय पैदा हुए और उन्होंने तारकासुर का वध किया। शिवरात्रि और महाशिवरात्रि दोनों का ही संदेश एक है...जो आया है, वह जाएगा भी। जब तारकासुर जैसा चला गया तो बाकी की क्या बिसात? लेकिन शिवरात्रि कुछ हटकर आनंदोत्सव है। गंगाधर की बारात का उत्सव। सो, जैसी शंकर जी की बारात रही होगी, वैसी ही बारात कांवड़ यात्रा के दौरान देखने को मिलती है। कांवडिय़ों के अलग और अनोखे रंग।
खड़ी कांवड़ से बाइकर्स बाराती तक
गोमुख, गंगोत्री और हरिद्वार से ग्ंगाजल लेकर आने वाले कांवडिय़ों के भी कई रूप हैं। अस्सी और नब्बे के दशक में खड़ी कांवड़ (जिसको रखा नहीं जा सकता) का प्रचलन अधिक था। अब खड़ी कांवड़ कम हो गई हैं। इनके स्थान पर झूला कांवड़ और डाक कांवड़ बढ़ गई हैं। हर साल इनकी संख्या बढ़ती जा रही है। जैसा जमाने का रंग बदला, वैसा ही कांवड़ का भी रंग बदल गया। अब से पन्द्रह साल पहले न तो दिल्ली-देहरादून राजमार्ग को बंद करने की नौबत आती थी और न आज जैसे कैंप लगते थे। लेकिन अब तो....?
बाईक, वैन, कारों और झांकियों के साथ भगवान शंकर का यह कारवां उल्लास, भक्ति और सावन की मस्ती का संगम है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक करीब एक करोड़ कांवडिय़ा हरिद्वार से गंगाजल लेकर निकलता है। इसमें से अस्सी फीसदी कांवड़ पुरेश्वरमहादेव (बागपत), बाबा औघडऩाथ (मेरठ) और दूधेश्वरनाथ (गाजियाबाद) में चढ़ती हैं।
तप से पश्चाताप
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श्रद्धा और विश्वास के इस पर्व में तप से पश्चाताप की कहानी है।
-सती ने पश्चाताप किया कि उन्होंने शंकर जी के आदेशों की अवहेलना क्यों की? वह अपर्णा बनीं। और पार्वती के रूप में जन्म लेकर उनको शंकर जी के रूप में वर प्राप्त हुए। पार्वती के बाद देवी का कोई अवतरण नहींं हुआ। यानी सती जन्म से उन्होंने सीख ली।
-ब्रह्मा जी को सीख मिली कि सोच-विचार कर वरदान देना चाहिए। भले ही कोई तप करे, लेकिन फलित अवश्य देख लेना चाहिए।
-कांवड़ यात्रा के जनक भगवान परशुराम ने भी पश्चातापवश कांवड़ उठाई थी। इसी का विराट स्वरूप आज का कांवड़-कुंभ है।
-निराकार और साकार एक ही ब्रह्म का नाम है। सर्जक, सृजन और सृष्टि का मूल मंत्र है सत्यम्, शिवम् और सुंदरम्। ऋणात्मक ऊर्जा को घनात्मक बनाने का नाम ही तो सावन है? वरना चौमासे में कोई विवाह करता है क्या? जीव जिन-जिन चीजों से दूर भागता है, वह सभी शंकर जी को प्रिय हैं। यही तो शिवोत्सव है। कल्याणोत्सव।
-सूर्यकांत द्विवेदी

शुक्रवार, 5 मार्च 2010

यूं हैं श्रीकृष्ण पूर्णावतार


जो कहना है कहो मगर कान्हा से, बुरा नहीं मानते हमारे माधव


-संत प्रवर विजय कौशल
हमारे समस्त अवतारों में भगवान श्री कृष्ण ऐसे अनोखे अवतार हैं जिनका जन्मोत्सव विश्व के हर कोने में निवास करने वाला हल वर्ग का हिंदू बड़े उत्साह, उल्लास और भाव से मनाता है। भारत में तो जेलों में, थानों में तथा पुलिस लाइनों में इतने उल्लास के साथ मनाते हैं कि ऐसा लगता है कि मानों भगवान श्री कृष्ण इस विभाग के निज देव हों। शास्त्रज्ञ विद्वानों में कई बार इस विषय पर शास्त्रार्थ होता है कि भगवान श्री राम और भगवान श्री कृष्ण में छोटा बड़ा कौन है। उनकी कलाओं की संख्या पर अनेक तरह की चर्चा होती है। वाद-विवाद होता है। होना भी चाहिए क्योंकि हिंदू समाज जड़ समाज नहीं है। पूर्ण विकसित चिंतन वाला समाज है। अपने भगवान पर खुलकर चर्चा करने की छूट और साहस यह हिंदुओं के पास है। अन्य समाज में तो भगवान के बारे में कुछ बोल पाना महाअपराध माना जाता है। कई बार इनकी चर्चाएं दंगे और अशांति का कारण भी बन जाती हैं। जीवन में आनंद और प्रसन्नता के लिए मनुष्य की चिंतन धारा प्रवाहमान होनी चाहिए। जड़ता मनुष्य को गूढ़ बना देती है। भगवान श्री कृष्ण विचारों की विकास धारा के मूर्तमत प्रतीक हैं। वैसे तो दोनों भगवानों की तुलना करना अविवेक सा लगता है। को बड़ छोट कहत अपराधू लेकिन भगवान श्री कृष्ण पूर्ण इसलिए कहलाए क्योंकि उन्होंने जीवन के समस्त आयामों को पूर्ण रूप से सहजता से स्वीकार किया है। उनके जीवन में जो भी है वह पूर्ण है। वे परम योगी हैं तो परम भोगी भी हैं। उनमें गीता का गंभीर ज्ञान भरा है। तो नृत्य और गायन भी पूर्ण है। वे इधर खेल में हैं तो उधर युद्ध में भी उपस्थित हैं। श्री कृष्ण ने जीवन की समग्रता को स्वीकार भी किया है और उसी को जिया भी है। इसलिए अन्य अवतारों से श्रीकृष्ण भिन्न दिखाई देते हैं। इसी कारण आप देखेंगे कि अन्य अवतारों की पूजा तो होती है। लेकिन भक्ति और उपासना श्री कृष्ण की होती है।
भगवान श्रीकृष्ण की समग्र्रता को आप एक रोचक वार्ता से बहुत अच्छी तरह समझ सकते हैं। एक बार एक विद्यालय मेंं श्रीकृष्ण जन्मोत्सव पर जाना हुआ। सभी विद्यार्थियों को कुछ न कुछ बोलना चाहिए ऐसा सोचकर मैने बच्चों से एक प्रश्न किया। हमने पूछा बोलो- भाई, श्रीराम जी में और श्री कृष्ण जी में क्या अंतर है? कई बच्चों ने वही पुरानी बातें सुना दीं। कि एक में १२ कलाएं हैं और एक में १६ हैं। किसी ने भेष का अंतर बताया तो किसी ने वंशी और धनुष वाण की तुलना की। बहुत बाद में एक और बालक ने जो बात कही वह मुझे बहुत सटीक लगी। और मै समझता हूं कि उस बालक का विषय भले ही शास्त्र की विद्वता के अनुसार न हो लेकिन वह श्री कृष्ण की पूर्णता को बताने के लिए पूर्ण है। उसने कहा कि महाराज जी! भगवान श्री कृष्ण में चार बातें अधिक हैं। हमने पूछा कौन-कौन सी? वह बोला, श्री कृष्ण ने खूब खाया, खूब खेला, खूब गाया और खूब नाचा। भगवान राम के जीवन में ये चारों दिखाई नहीं देती। बात तो यह बालक ने कही है लेकिन यह सत प्रतिशत सटीक है। हम अगर अपना भी जीवन देखें तो हमारे सब के जीवन से लगभग चार बातें गायब हैं। न तो हम खा पाते हैं, न जीवन में गीत है, न जीवन में नृत्य है और न ही हमारा जीवन खेल जैसा उछलता कूदता है। हम सबका जीवन टूटा-टूटा, भारी-भारी, खोया-खोया जैसा है। गीता और संगीत की जगह जीवन में कलह- क्लेश और उदासी भरी है। खाने के नाम पर तो घर खाने के सामानों से भरा है लेकिन जीवन से भूख गायब है। और जो जीवन खेल जैसा हल्का-फुल्का होना चाहिए था वह काम के बोझ से दबा जा रहा है। अगर श्री कृष्ण से मिलना है तो अपने जीवन में ये चारों बातों का समावेश करें।
भगवान श्री कृष्ण के जीवन को देखिए। उनके खाने की बात तो सभी जानते है। माखन मिश्री के वे कितने शौकीन है। अपने घर में तृप्ति नहीं हुई तो पड़ोस का चुराने पहुंच गए। आज भी बिहारी जी में प्रतिदिन छप्पन भोग लगते हंै लेकिन भगवान को कभी ऊब नहीं होती। अब उनके खेल की बात देखिए आपको मालूम है कि भगवान ने जितने भी राक्षस मारे सब खेल खेल में ही मारे। और यह सत्य भी है कि जीवन की दुष्प्रवृत्तियां खेल गए जीवन में ही परास्त की जा सकती है। हमारा तो खेल भी एक काम हो गया है हम हर क्रिया को काम बना देते है इसलिए वह भारी हो जाता है। भगवान श्री कृष्ण का संपूर्ण जीवन अगर देखें तो दिखाई देता है कि उनके बचपन से ही संघर्ष प्रारंभ हो गया था। लेकिन उस संघर्ष को उन्होंने जीवन के गीत और संगीत के रूप में ही स्वीकार किया है। उनकी मुरली और रास इसका प्रतीक है। जीवन भी एक रास है। और यह रास प्रतिक्षण जीवन में बल रहा है। जीवन के सभी रसों को स्वीकार कर लेना और उसमें भी नृत्य करना यही रास है। हम जीवन केमीठे रस को तो स्वीकार करते है लेकिन कसैले रस को थूकना चाहते है। इसलिए जीवन की पूर्णता और धन्यता का अनुभव नहीं कर पाते। भगवान श्री कृष्ण का जीवन गीतों और गायन से भरा है। गीता जीवन का वह गीत है जो महायुद्ध के मैदान में गाया गया था और आज तक गाया जा रहा है और आगे भी गाया जाता रहेगा। गीता कभी पूर्ण नहीं होगी। लेकिन हमारे जीवन से गीत गायब हो गया। हमारे जीवन से जब भी निकलती है तो गाली और कर्कष वाणी निकलती है। चौथा भगवान का संपूर्ण जीवन नृत्य से भरा हुआ है। भगवार श्रीकृष्ण की जितनी मुद्राऐं आप मंदिरों में देखेगें तो नृत्य की ही देखेगें। श्री कृष्ण नाम आते ही नृत्य ध्यान में आने लगता है। नृत्य उसी के जीवन में प्रकट हो सकता है जिसकेजीवन में शेष ऊपर कहीं गई तीनों बातें हो। आज हमारे जीवन से नृत्य गायब है। हमारे जीवन अनेको विकारों से इतना भारी हो गया है कि नृत्य तो दूर ठीक से जीवन में चल भी नहीं पा रहे है।
भगवान श्रीकृष्ण के जीवन की एक-एक बात अनूठी है। आप सदैव भगवान को किशोर अवस्था में ही देखेगें। कभी उनको दाढ़ी मूंछों में नहीं देखेगें। आखिर क्यों? क्या शरीर का नियम इनकेऊपर लागू नहीं हुआ? ऐसी बात नहीं है। शरीर केनियम तो सबके ऊपर लागू होते हैं लेकिन जो जीवन के समस्त आयामों को खेल के रूप में स्वीकार करते है वे सदैव किशोर और कौमार ही रहते हैं। भगवान श्रीकृष्ण का समस्त जीवन एक महोत्सव है। महालीला है। इसलिए कृष्ण भक्त भी आपको नाचते गाते मिलेगें। भगवान तो महाभारत के युद्ध को भी जीवन के एक खेल के रूप में ही स्वीकार करते हैं। युद्ध का यह क्षण भी ईश्वर की इच्छा से आया है। इसके स्वीकार करना ही जीव का धर्म है। यही गीता का सार संक्षेप है। निमित्त बनो-कर्ता मत बनो। तब पाप पुण्य से मुक्त हो जाओगे। भगवान कितने युद्ध से निर्लिप्त हैं कि सेना का हर व्यक्ति भगवान के हाथों से मरना चाहता है। इसलिए भगवान के हाथ में जो शस्त्र है उसका नाम सुदर्शन रखा गया है। सुदर्शन मृत्यु का प्रतीक है। अब आप कल्पना करिए कि जिनके हाथ की मृत्यु इतनी सुदंर हो उसके हाथ का जीवन कितना सुंदर होगा।
भगवान के जन्म की घटना भी बड़ी रहस्यपूर्ण है। भादों की गहन अंधकार और बादलों से धिरी काली रात, कंस का कारागार इसमें प्रभु का प्राकट्य हुआ। यह भगवान की कृपा और करूणा का दर्शन है। जीवन में कितना भी गहन अंधकार होख् परिस्थिति कितनी भी विकट और विपरीत हो, संकट के बादल धिरे हों, विपत्ति की कारा में बंद हो लेकिन प्रभु का सुमिरण और भरोसा करोगे तो संपूर्ण विपरीत परिस्थिति में भी प्रभु अपनी उपस्थिति का दर्शन कराते है। श्री कृष्णा जन्माष्टमी हमको निराशा से आशा की ओर, कष्टों से कृपा की ओर ले जाने की प्रेरणा देती है। जीवन को नृत्य, गायन, महोत्सव और महा रास में सराबोर करने का नाम है श्री कृष्ण जन्मोत्सव। यह हमारे जीवन में कितना आया है यह देखने की बात है।

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