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सूर्योपासना

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हिन्दू धर्म में सूर्य साक्षात देवता माने गए हैं। धार्मिक दृष्टि से सूर्य की उपासना व्यक्ति को निरोग और त्वचा रोग से मुक्त करती है। मनोकामनाओं की पूर्ति भी सूर्य पूजा से संभव है। असल में व्यावहारिक जीवन में भी सूर्य की रोशनी और ऊर्जा प्राणशक्ति का मुख्य साधन है। वैदिक काल से ही सूर्य शक्ति के देवता माने गए हैं। शास्त्रों में रविवार का दिन सूर्य पूजा के लिए बहुत ही शुभ फल देने वाला बताया गया है। सूर्य उपासना से शक्ति, सौंदर्य, तंदुरूस्ती और ज्ञान प्राप्ति होती है। जिससे ज़िंदगी में कामयाबी पाना आसान हो जाता है। वहीं इस उपासना में सूर्य के विशेष मंत्रों का जप मनोरथ पूर्ति में बहुत ही प्रभावी माने गए हैं। जानते हैं रविवार के दिन सूर्य उपासना के सरल उपायों को - - सुबह स्नान के बाद सूर्यदेव को अर्घ्य दें। अर्घ्य के लिए सफेद वस्त्र पहनकर एक पात्र में गंगा या शुद्ध जल लेकर उसमें लाल फूल डालकर और चंदन डालकर पूर्व दिशा की ओर मुख कर अर्घ्य दें। - इसके बाद पूजा में सूर्यदेव की प्रतिमा पर लाल फूल और लाल चन्दन लगाएं। साथ ही अन्य पूजन सामग्री अर्पित करें। - रविवार के दिन सूर्य मंत्र की अधिकाधिक माला ...

सूर्याष्टक

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सूर्याष्टक आदिदेव नमस्तुभ्यं प्रसीद मम भास्कर । दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोऽस्तुते ॥1॥ सप्ताश्वरथमारूढं प्रचण्डं कश्यपमात्मजम् । श्वेत पद्मधरं देवं तं सूर्य प्रणमाम्यहम ॥2॥ लोहितं रथमारूढं सर्वलोकपितामहम् । महापापहरं देवं तं सूर्य प्रणमाम्यहम ॥3॥ हे आदिदेव आपको नमस्कार है, मुझसे प्रसन्न होइये। हे दिवाकर! आपको नमन है। हे प्रभाकर! आपको नमन है। सप्ताश्वरथ पर आरूढ़, अत्यंत उग्र, कश्यपपुत्र, श्वेत, कमलधार देव उन सूर्य को मैं प्रणाम करता हूं। लोहित (लाल) वर्ण रंग के रथ पर आरूढ़ सब लोकों के पितामह, महापापों को हरने वाले, उन सूर्यदेव को मैं प्रणाम करता हूं॥1-3॥ त्रैगुण्यं च महाशूरं ब्रह्मविष्णुमहेश्वरम । महापापहरं देवं तं सूर्य प्रणमाम्यहम् ॥4॥ बश्हितं तेजर्पुद्बजं च वायुमाकाशमेव च । प्रभुं च सर्व लोकानां तं सूर्य प्रणमाम्यहम् ॥5॥ सत्व-रज-तम-मय, महान परामी, साक्षात ब्रह्मा-विष्णु-महेश, महापापों को हरने वाले उन सूर्य देव को मैं प्रणाम करता हूं। वश्हत् तेज पुद्बज, आकाश, वायु, सब लोकों के प्रभु उन सूर्य देव को मैं प्रणाम करता हूं॥4-5॥ बंधुक पुष्पसंकाशं हारकुण्डलभूषितम् । एकचधरं देवं तं सूर...

निराला भोला

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श्रावण मास भगवान शंकर को समर्पित है। हर तरफ भोले हैं। शिव के मतवाले हैं। कांवड़ ही कांवड़। गंगाजल की यात्रा। गंगाधर का गान। मानो. शंकर जी की बारात चढ़ रही है। वस्तुत: यह शंकर जी के पाणिग्रहण का ही उत्सव है। श्रावण मास की शिवरात्रि भगवान शंकर और पार्वती के मिलन का उत्सव है। फाल्गुन मास की शिवरात्रि ही महाशिवरात्रि कही गई। महाशिवरात्रि निराकार भक्ति का पर्व है तो शिवरात्रि साकार भक्ति का पर्व। एको हि रुद्रो द्वितीयानस्तु..। एक ही रुद्र है दूसरा नहीं है। यह भारतीय सनातन परंपरा में एकेश्वरवाद के सिद्धांत का निष्पादन करती है। हम बहुदेववादी माने जाते हैं। निराकारत्व की बात हम नहीं करते। लेकिन शंकर जी के सत्यं, शिवम् और सुंदरम् का संदेश ही इस एकेश्वरवाद में निहित है। सत्य क्या है...सृजन-संहार। शिवम क्या है...संतान और सुंदरम क्या है....सृष्टि। इन्हीं तीनों के निहितार्थ बना ऊं। अ+उ+म। अकार, उकार और मकार। यानी सृष्टि, पालन और संहार। यही सनातन सत्य है और इसी को हम यह कहकर अंगीकार करते हैं कि सबको पैदा करने वाला, पालन करने वाला और संहार करने वाला तो परमपिता परमेश्वर है। फाल्गुन मास की महाशिवरात्र...

यूं हैं श्रीकृष्ण पूर्णावतार

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जो कहना है कहो मगर कान्हा से, बुरा नहीं मानते हमारे माधव -संत प्रवर विजय कौशल हमारे समस्त अवतारों में भगवान श्री कृष्ण ऐसे अनोखे अवतार हैं जिनका जन्मोत्सव विश्व के हर कोने में निवास करने वाला हल वर्ग का हिंदू बड़े उत्साह, उल्लास और भाव से मनाता है। भारत में तो जेलों में, थानों में तथा पुलिस लाइनों में इतने उल्लास के साथ मनाते हैं कि ऐसा लगता है कि मानों भगवान श्री कृष्ण इस विभाग के निज देव हों। शास्त्रज्ञ विद्वानों में कई बार इस विषय पर शास्त्रार्थ होता है कि भगवान श्री राम और भगवान श्री कृष्ण में छोटा बड़ा कौन है। उनकी कलाओं की संख्या पर अनेक तरह की चर्चा होती है। वाद-विवाद होता है। होना भी चाहिए क्योंकि हिंदू समाज जड़ समाज नहीं है। पूर्ण विकसित चिंतन वाला समाज है। अपने भगवान पर खुलकर चर्चा करने की छूट और साहस यह हिंदुओं के पास है। अन्य समाज में तो भगवान के बारे में कुछ बोल पाना महाअपराध माना जाता है। कई बार इनकी चर्चाएं दंगे और अशांति का कारण भी बन जाती हैं। जीवन में आनंद और प्रसन्नता के लिए मनुष्य की चिंतन धारा प्रवाहमान होनी चाहिए। जड़ता मनुष्य को गूढ़ ब...

शिव बनो-शिव जपो

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परिचय संत प्रवर विजय कौशल महाराज रामकथा वाचक हैं। उनका मेरे ऊपर अनन्य उपकार है। उनकी सदकृपा से मुझे हनुमानजी के रूप में श्रीगुरु की प्राप्ति हुई। संत विजयकौशल जी की देश-विदेश में श्रीरामकथा की अमृतवाणी गूंजती है। हाल ही में वह श्रीलंका में अशोक वाटिका में श्रीरामकथा का आख्यायन करके आए हैं। सुंदर गेय शैली में श्रीरामकथा का अमृतपान कराने वाले कौशलजी कथा के साथ सामाजिक-राष्ट्रीय संदर्भो की विशद मीमांसा करते हैं। व्रंदावन में आश्रम, निवास और प्रवास। श्रीरामचरितमानस के शिव प्रसंग में पार्वती जी की विदाई के प्रसंग का कारुणिक चित्रण हर आंख को रुला देता है। आप भी पढिए। सूर्यकांत द्विवेदी शिव कृपा चाहिए तो जीवन को श्रद्धा से भरिए -संत प्रवर विजय कौशल हमारे ऋषि-मुनियों का यह अनुभव है कि इस सृष्टि के प्रारंभ होने के पूर्व भी सर्वत्र शिव तत्व ही व्याप्त था। शिव तत्व से ही सृष्टि उत्पन्न हुई। इसलिए सृष्टि के जन्मदाता का विचार तो हो सकता है, लेकिन शिव तो अजन्मा हैं, शिव तो अविनाशी हैं, अखंड हैं। वे तो स्वयं मृत्यु के स्वामी हैं, संहार के देवता हैं। अरे! संहारक का कौन संहार करेगा। भ...

जप लो हरि का नांम

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कैसे करें आप देव पूजार्चन पूजा का अर्थ है समर्पण। समर्पण का नाम ही आस्था है। आस्तिकता कर्मकांड में नहीं है। भगवान के प्रति समर्पण और भाव में है। अक्सर लोग, कर्मकांड और पूजा विधान को एकही मान लेते हैं। भगवान की भक्ति के लिए मन, वचन और कर्म की प्रधानता चाहिए। भक्ति के तत्व दस हैैं। इसमें वही सभी तत्व हैं जो धर्म में हैं। दशो महाविद्या की सार भी धर्म में ही है। धर्म में ही जीवन की कुंजी है। धर्म में ही जीवन को जीने का मर्म छिपा है। बहुभाषी और बहुदेवतावादी समाज में अक्सर यह प्रश्न रहता है कि हम किसकी आराधना करें और कितनी देर करें। कर्मकांड पर जाएं तो लंबे-चौड़े विधान हैं। लेकिन सनातन व्यवस्था में ध्यान को महत्व दिया गया है, कर्म को महत्व दिया गया है, भाव को महत्व दिया गया है। वाणी यदि दूषित हो तो राम-राम जपने का लाभ नहीं। कर्म यदि दूसरे को पीड़ा पहुंचाने वाले हों तो घंटों पूजा में बैठने का कोई अर्थ नहीं। गोस्वामी तुलसीदास ने परहित को ही धर्म की संज्ञा कहा है। आज के आपाधापी और व्यस्तता भरे जीवन में बहुत से लोगों को यही कहते सुना जाता है कि पूजा में समय बहुत लग जाता है। कई लोगों के विधान ट...

शनि कठोर शासक-उदार देवता

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शनि महाराज कठोर नहीं हैं भय की उत्पत्ति कैसे हुई? भय का कारक मन है। मन चंचल है। शंकालु है। भय के बिना प्रीति नहीं होती। यदि कहें कि ईश्वर नहीं है। तुम्हारा कुछ नहीं बिगड़ेगा। तुम नहीं मरोगे। घर में क्लेश नहीं होगा। धन-धान्य के साथ तुम सदा ही सुख शांति से जीवन व्यतीत करोगे। तो शायद कोई भी ईश्वर की शरण में न जाए। लेकिन यह कपोलकल्पित अवधारणा होगी। जो शाश्वत है, उसको स्वीकारना होगा। सत्य है कि जो आया है, वह जाएगा भी। इसी प्रकार यह भी सत्य है कि लोक-प्रशासन फूलों से नहीं चला करता। अगर फूलों से चला होता तो दंड की आवश्यकता ही नहीं होती। न अदालतें होतीं, न सामाजिक पंचायतें होतीं, न कानून होता, न जेल होती और न होती पुलिस-सेना। यानि सत्ता-प्रशासन के लिए दंड को प्रबल माना गया। संभवतया यही कारण रहा होगा कि दंड (लाठी-डंडा-स्टिक-शस्त्र-अस्त्र) राजा-महाराजा से लेकर पुलिस और सेना तक आजतक है। किसी भी सैन्य और पुलिसकर्मी की पहचान उसके दंड से है। राजा की भी पहचान दंड से है। सत्ता की पहचान भी दंड से है। देश की पहचान वहां की सामाजिक व्यवस्था और दंड विधान से है। हर देश की दंड संहिता है। ऐसे में यदि तीनों लो...