श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर विशेष

कान्हा के बारे में यह भी जानिए भगवान श्रीकृष्ण पूर्णावतार हैं। लीलाधर। वह समस्त प्राणियों के हृदय में अनेकानेक रूपों में वास करते हैं। श्रीकृष्ण ने सभी को जाना लेकिन उनको कोई नहीं जान सका। वह बालक हैं, किशोर हैं, योगीराज हैं, कर्मपुरुष हैं, वह गुरु हैं, वह गोपाल हैं, केशव हैं, माधव हैं, मुरलीधर हैं, रासविहारी हैं, जगत विहारी हैं, युग प्रवर्तक हैं, प्रेमी हैं, शासक हैं, युद्ध संचालक, महान धनुर्धर हैं, सारथी हैं, मित्र हैं, करुणावतार हैं, दीनानाथ हैं, स्त्री उद्धारक हैं, मातृभक्त हैं, वेदों के विख्याता-आख्याता, अष्टावक्र गीता के उद्घोषक, कर्मप्रधान, नीति प्रधान, योग प्रधान, सांख्य प्रधान, गोपीजनवल्लभ, अच्युतानंद आदि अनेकानेक रूप से ख्यात हैं। लीलाएं अनंत। लेकिन उनको प्रिय है- अपनी बाल लीला। वो भी कौन सी- जब उन्होंने मुंह में मिट्टी रख ली। संभवतया यही कारण है कि कलियुग में भी उनको अपनी यही बाललीला पसंद है। वह बाल गोपाल अर्थात ठाकुरजी के रूप में ही अपने भक्तों के पास रहना चाहते हैं। आइये, ठाकुर जी के बारे में थोड़ा जानने का प्रयास करते हैं.... आठ का अंक : कृष्ण के जीवन में आठ के अंक का विशेष महत्व है। उनका जन्म आठवें मनु के काल में अष्टमी के दिन वसुदेव के आठवें पुत्र के रूप में जन्म हुआ था। उनकी आठ सखियां, आठमित्र और आठ शत्रु थे। *कृष्ण के माता-पिता : कृष्ण की माता का नाम देवकी और पिता का नाम वसुदेव था। कारागार में जन्म हुआ। पालन-पोषण किया- यशोदा और नंद ने। बलराम की माता रोहिणी ने भी उन्हें माता के समान दुलार दिया। रोहिणी वसुदेव की पत्नी थीं। यह भी जानिए *कृष्ण के गुरु : गुरु संदीपनि ने कृष्ण को वेद शास्त्रों सहित 14 विद्या और 64 कलाओं का ज्ञान दिया था। कृष्ण के भाई : कृष्ण के भाइयों में नेमिनाथ, बलराम और गद थे। कृष्ण की बहनें : कृष्ण की तीन बहनें थी : 1. एकानंगा (यह यशोदा की पुत्री थीं)। 2. सुभद्रा : वसुदेव की दूसरी पत्नी रोहिणी से बलराम और सुभद्र का जन्म हुआ। वसुदेव देवकी के साथ जिस समय कारागृह में बंदी थे, उस समय ये नंद के यहां रहती थीं। 3. द्रौपदी : पांडवों की पत्नी द्रौपदी हालांकि कृष्ण की बहन नहीं थी, लेकिन श्रीकृष्ण इसे अपनी मानस ‍भगिनी मानते थे। चीर हरण के समय श्रीकृष्ण ने ही द्रोपदी की लाज बचाई थी। कृष्ण की पत्नियां : रुक्मिणी, जाम्बवंती, सत्यभामा, मित्रवंदा, सत्या, लक्ष्मणा, भद्रा और कालिंदी। कृष्ण के पुत्र : रुक्मणी से प्रद्युम्न, चारुदेष्ण, जम्बवंती से साम्ब, मित्रवंदा से वृक, सत्या से वीर, सत्यभामा से भानु, लक्ष्मणा से..., भद्रा से... और कालिंदी से...। कृष्ण की पुत्रियां : रुक्मणी से कृष्ण की एक पुत्री थीं जिसका नाम चारू था। कृष्ण के पौत्र : प्रद्युम्न से अनिरुद्ध। अनिरुद्ध का विवाह वाणासुर की पुत्री उषा के साथ हुआ था। कृष्ण की 8 सखियां : राधा, ललिता आदि सहित कृष्ण की 8 सखियां थीं। चन्द्रावली, श्यामा, शैव्या, पद्या, राधा, ललिता, विशाखा तथा भद्रा। कुछ जगह ये नाम इस प्रकार हैं- चित्रा, सुदेवी, ललिता, विशाखा, चम्पकलता, तुंगविद्या, इन्दुलेखा, रग्डदेवी और सुदेवी। इसके अलावा भौमासुर से मुक्त कराई गई सभी महिलाएं कृष्ण की सखियां थीं। कृष्ण के 8 मित्र : श्रीदामा, सुदामा, सुबल, स्तोक कृष्ण, अर्जुन, वृषबन्धु, मन:सौख्य, सुभग, बली और प्राणभानु। कृष्ण के शत्रु : कंस, जरासंध, शिशुपाल, कालयवन, पौंड्रक। कृष्ण ने किया जिनका वध : ताड़का, पूतना, चाणूड़, शकटासुर, कालिया, धेनुक, प्रलंब, अरिष्टासुर, बकासुर, तृणावर्त अघासुर, मुष्टिक, यमलार्जुन, द्विविद, केशी, व्योमासुर, कंस, प्रौंड्रक और नरकासुर आदि। कृष्ण चिन्ह : सुदर्शन चक्र, मोर मुकुट, बंसी, पांचजन्य शंख, गाय, कमल का फूल और माखन मिश्री। कृष्ण लोक : वैकुंठ, गोलोक, विष्णुलोक। कृष्ण ग्रंथ : महाभारत और गीता कृष्ण का कुल : यदुकुल। कृष्ण के समय उनके कुल के कुल 18 कुल थे। इस कुल की कुल 18 शाखाएं थीं। व्रज और हस्तिनापुर श्रीकृष्ण के पौत्र वज्रनाभ को द्वारिका से मथुरा लाकर उन्हें मथुरा जनपद का शासक बनाया गया। इसी समय परीक्षित भी हस्तिनापुर की गद्दी पर बैठाए गए। वज्र के नाम पर बाद में यह संपूर्ण क्षेत्र ब्रज कहलाने लगा। कृष्ण नगर : मथुरा, गोकुल, नंदगाव, वृंदावन, गोवर्धन, बरसाना, मधुवन और द्वारिका। कृष्ण पर्व : श्रीकृष्णी ने ही होली और अन्नकूट महोत्सव की शुरुआत की थी। आयु- उनकी आयु १२५ और कुछ ११० वर्ष बताते हैं। ऐसे थे श्रीकृष्ण.... कृष्ण की त्वचा का रंग मेघश्यामल था -कॄष्ण के परमधामगमन के समय ना तो उनका एक भी केश श्वेत था और ना ही उनके शरीर पर कोई झुर्री थी -कॄष्ण से बदली गयी यशोदापुत्री का नाम एकानंशा था। राधा रानी * कॄष्ण की प्रेमिका ' राधा ' का जिक्र महाभारत , हरिवंशपुराण , विष्णुपुराण और भागवतपुराण में नहीं है , उनका उल्लेख बॄम्हवैवर्त पुराण , गीत गोविंद और जनश्रुतियों में रहा है। यह भी माना जाता है कि श्रीकृष्ण सिर्फ एक बार राधा से मिले थे। कॄष्ण अंतिम वर्षों को छोड्कर कभी भी द्वारिका में ६ महीने से ज्यादा नहीं रहे . -कॄष्ण के धनुष का नाम शार्ंग और मुख्य आयुध चक्र का नाम ' सुदर्शन ' था। कृष्ण ने दो नगरों की स्थापना की थी - द्वारिका (कुशावती) और पांडव पुत्रो के द्वारा इंद्रप्रस्थ (पूर्व में खांडवप्रस्थ, वर्तमान में दिल्ली और आसपास का क्षेत्र। कर्मक्षेत्र- हस्तिनापुर, इंद्रप्रस्थ और कुरुक्षेत्र ( जहां महाभारत हुई) सर्वाधिक समय- श्रीकृष्ण का अधिकांश समय इंद्रप्रस्थ ( एनसीआर) और हस्तिनापुर में ही बीता प्रसिद्ध लीला- मिट्टी खाना श्रीकृष्ण आराधना ( इनकी आराधना से चारों कृपा मिलती हैं) -ईश्वरकृपा, शास्त्रकृपा, गुरुकृपा और आत्मकृपा। प्रिय रास- डांडिया प्रिय पर्व- होली और अन्नकूट प्रिय भोग- माखन-मिश्री प्रिय पेड़- कदंब प्रिय वादन- वंशी प्रिय पोशाक- पीतांबर प्रिय चिह्न- मोर पंख प्रिय स्नान- शंखाभिषेक प्रिय स्वरूप- बाल गोपाल ( ठाकुरजी) प्रिय मंत्र- ऊं नमो भगवते वासुदेवाय नम: प्रिय धार्मिक शास्त्र-श्रीमद्भागवत और गीता सूर्यकांत

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