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ठाकुर जी के नाम पाती

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ठाकुरजी जो पाती मैं लिख रहा हूं, वह न जाने कितने लोग लिखने का प्रयास करते होंगे। कितनों ने लिखी भी होगी। अंतस की आवाज से। दिल की कलम से। आंखों की स्याही से। मेरी पाती तो मेरी है। सबकी अपनी पाती होती है। मेरी भी अपनी पाती है। जीवन में आपसे अलग रहा। भटका रहा। नाम सुना था, लेकिन अब आपका ही नाम है। रामनाम को महामंत्र कहा गया है। रामनाम को मोक्ष का द्वार कहते हैं। तुम तो आदि-अनंत हो। क्या जीवन में आदि और अंत होता है। संघर्षों की भट्टी में जब तपकर जीवन को तलाशने की कोशिश करता हूं तो आपका हंसता-मुस्कराता चेहरा सामने आ जाता है। लड्डू खाते हुए। माखन खाते हुए। घुटनों के बल चलते हुए। दुख टूटते हैं तो कुंती का महावाक्य याद आ जाता है-प्रभु मुझको सुख मत देना। मैं तुमसे दुख मांगती हूं।दुख होगा तो आपका सानिध्य मुझको प्राप्त होता रहेगा। ठाकुरजी, मैं कुंती नहीं हूं। कुंती जीवन नहीं हो सकता। वह तो तप और साधना का जीवन है। न हम अर्जुन बन सकते हैं और न कुंती। हम तो आपके द्वारा दिए गए शरीर की आयु पूरी कर रहे हैं। हम महामानव नहीं। हम देव नहीं। हम असुर नहीं। हम क्या हैं, यह हम को भी नहीं पता। आपको तो सब पता हो...

भगवान के दर पर यह कैसा अन्याय

भगवान के दर पर यह कैसा पुण्य? तीर्थों पर जब मैं हांफते, सहमते और अनायास ही जेब ढीली करते यात्रियों को देखता हूं, तो एक दर्द सवाल दागता है...तीर्थ क्यों? क्या हम तीर्थ पर केवल जेब खाली करने के लिए आए हैं? यह कैसी पुण्य नगरी, जहां लोग पाप से डरते नहीं। किसी को लूटना, नाजायज पैसे लेना और उनको ठगना भी इसी पाप की श्रेणी में आता है। लेकिन सभी धर्मस्थलों का एक सा ही हाल हो चला है। हजारों और लाखों यात्री आते हैं। धर्म की बैसाखियां उनके पैरों मेंं जंजीर बनकर रह जाती हैं। बस या रेल से उतरे नहीं, कि लुटाई का सिलसिला चल पड़ता है। लोगों के मुंह से शायद यही निकलता है, इससे अच्छे तो हम अपने शहर में भले थे? ऐसा क्यों? गरमियों की छुट्टियां पड़ते ही लोगों की भीड़ तीर्थों पर निकल पड़ती है. अपनी-अपनी इच्छाओं के मुताबिक लोग यात्रा पर जाते हैं। जिन इच्छाओं को लेकर वे जाते हैं और जिस शांति और पुण्य की तलाश उनको होती है, वह शायद ही इस यात्रा में उनको मिलती है। किसी भी तीर्थ पर चले जाइये, पैसे के बिना पुण्य नहीं। जितना पैसा उतनी पुण्य की कामना। जितना घी उतनी धर्म की लौ तेज। ऐसा क्यों? हमको यह सच्चाई मानने मे...