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यूं हैं श्रीकृष्ण पूर्णावतार

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जो कहना है कहो मगर कान्हा से, बुरा नहीं मानते हमारे माधव -संत प्रवर विजय कौशल हमारे समस्त अवतारों में भगवान श्री कृष्ण ऐसे अनोखे अवतार हैं जिनका जन्मोत्सव विश्व के हर कोने में निवास करने वाला हल वर्ग का हिंदू बड़े उत्साह, उल्लास और भाव से मनाता है। भारत में तो जेलों में, थानों में तथा पुलिस लाइनों में इतने उल्लास के साथ मनाते हैं कि ऐसा लगता है कि मानों भगवान श्री कृष्ण इस विभाग के निज देव हों। शास्त्रज्ञ विद्वानों में कई बार इस विषय पर शास्त्रार्थ होता है कि भगवान श्री राम और भगवान श्री कृष्ण में छोटा बड़ा कौन है। उनकी कलाओं की संख्या पर अनेक तरह की चर्चा होती है। वाद-विवाद होता है। होना भी चाहिए क्योंकि हिंदू समाज जड़ समाज नहीं है। पूर्ण विकसित चिंतन वाला समाज है। अपने भगवान पर खुलकर चर्चा करने की छूट और साहस यह हिंदुओं के पास है। अन्य समाज में तो भगवान के बारे में कुछ बोल पाना महाअपराध माना जाता है। कई बार इनकी चर्चाएं दंगे और अशांति का कारण भी बन जाती हैं। जीवन में आनंद और प्रसन्नता के लिए मनुष्य की चिंतन धारा प्रवाहमान होनी चाहिए। जड़ता मनुष्य को गूढ़ ब...

शिव बनो-शिव जपो

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परिचय संत प्रवर विजय कौशल महाराज रामकथा वाचक हैं। उनका मेरे ऊपर अनन्य उपकार है। उनकी सदकृपा से मुझे हनुमानजी के रूप में श्रीगुरु की प्राप्ति हुई। संत विजयकौशल जी की देश-विदेश में श्रीरामकथा की अमृतवाणी गूंजती है। हाल ही में वह श्रीलंका में अशोक वाटिका में श्रीरामकथा का आख्यायन करके आए हैं। सुंदर गेय शैली में श्रीरामकथा का अमृतपान कराने वाले कौशलजी कथा के साथ सामाजिक-राष्ट्रीय संदर्भो की विशद मीमांसा करते हैं। व्रंदावन में आश्रम, निवास और प्रवास। श्रीरामचरितमानस के शिव प्रसंग में पार्वती जी की विदाई के प्रसंग का कारुणिक चित्रण हर आंख को रुला देता है। आप भी पढिए। सूर्यकांत द्विवेदी शिव कृपा चाहिए तो जीवन को श्रद्धा से भरिए -संत प्रवर विजय कौशल हमारे ऋषि-मुनियों का यह अनुभव है कि इस सृष्टि के प्रारंभ होने के पूर्व भी सर्वत्र शिव तत्व ही व्याप्त था। शिव तत्व से ही सृष्टि उत्पन्न हुई। इसलिए सृष्टि के जन्मदाता का विचार तो हो सकता है, लेकिन शिव तो अजन्मा हैं, शिव तो अविनाशी हैं, अखंड हैं। वे तो स्वयं मृत्यु के स्वामी हैं, संहार के देवता हैं। अरे! संहारक का कौन संहार करेगा। भ...

जप लो हरि का नांम

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कैसे करें आप देव पूजार्चन पूजा का अर्थ है समर्पण। समर्पण का नाम ही आस्था है। आस्तिकता कर्मकांड में नहीं है। भगवान के प्रति समर्पण और भाव में है। अक्सर लोग, कर्मकांड और पूजा विधान को एकही मान लेते हैं। भगवान की भक्ति के लिए मन, वचन और कर्म की प्रधानता चाहिए। भक्ति के तत्व दस हैैं। इसमें वही सभी तत्व हैं जो धर्म में हैं। दशो महाविद्या की सार भी धर्म में ही है। धर्म में ही जीवन की कुंजी है। धर्म में ही जीवन को जीने का मर्म छिपा है। बहुभाषी और बहुदेवतावादी समाज में अक्सर यह प्रश्न रहता है कि हम किसकी आराधना करें और कितनी देर करें। कर्मकांड पर जाएं तो लंबे-चौड़े विधान हैं। लेकिन सनातन व्यवस्था में ध्यान को महत्व दिया गया है, कर्म को महत्व दिया गया है, भाव को महत्व दिया गया है। वाणी यदि दूषित हो तो राम-राम जपने का लाभ नहीं। कर्म यदि दूसरे को पीड़ा पहुंचाने वाले हों तो घंटों पूजा में बैठने का कोई अर्थ नहीं। गोस्वामी तुलसीदास ने परहित को ही धर्म की संज्ञा कहा है। आज के आपाधापी और व्यस्तता भरे जीवन में बहुत से लोगों को यही कहते सुना जाता है कि पूजा में समय बहुत लग जाता है। कई लोगों के विधान ट...

शनि कठोर शासक-उदार देवता

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शनि महाराज कठोर नहीं हैं भय की उत्पत्ति कैसे हुई? भय का कारक मन है। मन चंचल है। शंकालु है। भय के बिना प्रीति नहीं होती। यदि कहें कि ईश्वर नहीं है। तुम्हारा कुछ नहीं बिगड़ेगा। तुम नहीं मरोगे। घर में क्लेश नहीं होगा। धन-धान्य के साथ तुम सदा ही सुख शांति से जीवन व्यतीत करोगे। तो शायद कोई भी ईश्वर की शरण में न जाए। लेकिन यह कपोलकल्पित अवधारणा होगी। जो शाश्वत है, उसको स्वीकारना होगा। सत्य है कि जो आया है, वह जाएगा भी। इसी प्रकार यह भी सत्य है कि लोक-प्रशासन फूलों से नहीं चला करता। अगर फूलों से चला होता तो दंड की आवश्यकता ही नहीं होती। न अदालतें होतीं, न सामाजिक पंचायतें होतीं, न कानून होता, न जेल होती और न होती पुलिस-सेना। यानि सत्ता-प्रशासन के लिए दंड को प्रबल माना गया। संभवतया यही कारण रहा होगा कि दंड (लाठी-डंडा-स्टिक-शस्त्र-अस्त्र) राजा-महाराजा से लेकर पुलिस और सेना तक आजतक है। किसी भी सैन्य और पुलिसकर्मी की पहचान उसके दंड से है। राजा की भी पहचान दंड से है। सत्ता की पहचान भी दंड से है। देश की पहचान वहां की सामाजिक व्यवस्था और दंड विधान से है। हर देश की दंड संहिता है। ऐसे में यदि तीनों लो...

ठाकुर जी के नाम पाती

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ठाकुरजी जो पाती मैं लिख रहा हूं, वह न जाने कितने लोग लिखने का प्रयास करते होंगे। कितनों ने लिखी भी होगी। अंतस की आवाज से। दिल की कलम से। आंखों की स्याही से। मेरी पाती तो मेरी है। सबकी अपनी पाती होती है। मेरी भी अपनी पाती है। जीवन में आपसे अलग रहा। भटका रहा। नाम सुना था, लेकिन अब आपका ही नाम है। रामनाम को महामंत्र कहा गया है। रामनाम को मोक्ष का द्वार कहते हैं। तुम तो आदि-अनंत हो। क्या जीवन में आदि और अंत होता है। संघर्षों की भट्टी में जब तपकर जीवन को तलाशने की कोशिश करता हूं तो आपका हंसता-मुस्कराता चेहरा सामने आ जाता है। लड्डू खाते हुए। माखन खाते हुए। घुटनों के बल चलते हुए। दुख टूटते हैं तो कुंती का महावाक्य याद आ जाता है-प्रभु मुझको सुख मत देना। मैं तुमसे दुख मांगती हूं।दुख होगा तो आपका सानिध्य मुझको प्राप्त होता रहेगा। ठाकुरजी, मैं कुंती नहीं हूं। कुंती जीवन नहीं हो सकता। वह तो तप और साधना का जीवन है। न हम अर्जुन बन सकते हैं और न कुंती। हम तो आपके द्वारा दिए गए शरीर की आयु पूरी कर रहे हैं। हम महामानव नहीं। हम देव नहीं। हम असुर नहीं। हम क्या हैं, यह हम को भी नहीं पता। आपको तो सब पता हो...